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Mahavir Jayanti 2021: महावीर जयंती (जीवन परिचय और इतिहास)

    Mahavir Jayanti 2021 Date in India: कब, क्यों और कैसे मनायी जाती है महावीर जयंती जानिए जैन धर्म के सिद्धांत

    Mahaveer Jayanti 2021: स्वामी महावीर जी की जयंती हर साल चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को मनाई जाती है, जो अंग्रेजी केलेन्डर के अनुसार मार्च या अप्रैल महीने मे पड़ता है। इस साल 2021 में महावीर स्वामी की जयंती 25 अप्रैल को रविवार के दिन है।

    महावीर जी का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व आज ही के दिन बिहार के वैशाली स्थित एक गांव के राजपरिवार में हुआ था।

    जैन धर्म के 24वें और आख़िरी तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक के उत्सव को महावीर जयंती के रूप मनाया जाता है यह जैन धर्म का एक मुख्य त्यौहार है।


    पूरी दुनिया में अंहिसा और सत्य का संदेश देने वाले महावीर स्वामी को जैन धर्म का पंचशील भी बताया जाता है और हर साल दुनियाभर में महावीर जयंती को जैन धर्म के लोगों द्वारा बड़े ही धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता हैं। हालंकि इस बार भी कोरोना वायरस के चलते सभी त्यौहार घर पर ही मनाए जा रहे है इसलिए लोगों को इसे भी घर पर ही मनाना पड़ेगा।

    Happy Mahavir Jayanti 2021 Images
    Happy Mahavir Jayanti 2021 Images

    आइए अब आपको महावीर जयंती कब, क्यों और कैसे मनाते है, जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत और स्वामी महावीर कौन थे जीवनी तथा इतिहास (Mahavir Swami History in Hindi) एवं Mahavir Swami 27 Bhav Story in Hindi के बारे में बताते है।


    भगवान महावीर जी का जीवन परिचय और इतिहास:

    जन्म: स्वामी महावीर का जन्म एक साधारण बालक के रूप में चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को भारत में बिहार और वैशाली के पास स्थित कुण्डलपुर गांव में ईसा से 599 वर्ष पूर्व (लगभग ढाई हजार साल पहले) एक इक्ष्वाकु वंश में हुआ। आपके बचपन का नाम वर्धमान था।


    माता-पिता: वर्धमान के पिता का नाम सिद्धार्थ था जो एक क्षत्रिय राजा थे और उनकी माता जी का नाम त्रिशला (लिच्छवी राजकुमारी) था। महावीर स्वामी के एक भाई थे जिनका नाम नंदिवर्धन और बहन का नाम सुदर्शना था।


    विवाह: वर्धमान अपने जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते थे परन्तु उनके माता-पिता द्वारा इनका विवाह यशोदा नाम की एक कन्या के साथ सम्पन्न हुआ। जिससे इन्हें प्रियदर्शिनी नामक कन्या की प्राप्ति हुई।


    कठिन साधना: संपन्न परिवार से संबंध रखते हुए भी अपनी बहुत छोटी आयु में ही उन्होंने समस्त सुखों को त्यागकर साधना की तरफ कदम बढ़ाया और दिगम्बर साधु की कठिन चर्या का पालन करते हुए करीबन साढ़े बारह वर्षों की कठिन तपस्या और मौन साधना की थी। इसलिए उन्हें महावीर के नाम से भी संबोधित किया जाता है।


    मृत्यु: 527 ईसा पूर्व कार्तिक मास की कृष्ण अमावस्या को बिहार के पावापुरी (राजगीर) में स्थित जल मंदिर में 72 वर्ष की आयु में तीर्थंकर महावीर भगवान को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हुआ। जिसे दीपावली के रूप में मनाया जाता है।


    संदेश: आपने दुनियाभर में अहिंसा परमो धर्म: का संदेश दिया जिसका अर्थ है कि 'अहिंसा सभी धर्मों से सर्वोपरि है'।


    अंतिम तीर्थंकर: जैन ग्रंथों की माने तो महावीर जी का जन्म 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के मोक्ष प्राप्त करने के लगभग 188 वर्ष बाद हुआ था। और यह २४वें और अंतिम तीर्थंकर थे।



    महावीर जयंती क्यों मनायी जाती है?

    जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा महावीर जयंती का पर्व भगवान महावीर के जन्म एवं जैन धर्म की पुनः स्थापना के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इनके जन्मदिन को महावीर जन्म कल्याणक नाम से भी जानते है, और दुनियाभर को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाने वाले महावीर जी को जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के रूप में भी जाना जाता है।


    महावीर द्वारा चार तीर्थों यानि साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका की स्थापना करने के कारण इन्हें तीर्थंकर भी कहा जाता हैं। यहां तीर्थंकर का तात्पर्य कठिन साधना से अपनी आत्मा को तीर्थ बनाने से है। अतिवीर के इन्ही सदविचारों के कारण आज भी वे लोगों द्वारा याद किए जाते हैं।


    महावीर जयंती कैसे मनाते है?

    जैन धर्म का अनुसरण करने वालों द्वारा इस दिन को बड़े ही धूमधाम से और भगवान महावीर को याद करके मनाया जाता है। इस दिन जैन धर्म के अनुयायी महावीर जी की प्रतिमा को शुद्धता से परिपूर्ण करने के लिए जल और सुगंधित तेलों से धोते हैं।

    इस अवसर पर जैन मंदिरों को काफी अच्छे से सजाया जाता है और कई शोभायात्रायें भी निकाली जाती है, जिसमें जैन भिक्षुओं द्वारा भगवान महावीर की प्रतिमा को रथयात्रा एवं नगर भ्रमण कराया जाता हैं और उनके उपदेशों और सिद्धांतों को जन-जन तक पहुँचाया जाता हैं।


    भारत में ही भगवान महावीर का जन्म एवं मोक्ष प्राप्त हुआ इसलिए इस ख़ास मौके पर, दुनिया भर से महावीर भक्त भारत के जैन मंदिरों में दर्शन करने आते हैं। परंतु कोरोना वायरस के चलते इस बार शोभायात्रा नहीं निकल पाएगी। और ना ही इस साल किसी भी तरह का कार्यक्रम होना संभव है।


    भगवान महावीर और जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत:

    भगवान महावीर ने जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत दर्शाएं जो हैं - अहिंसा, सत्य, अचौर्य (अस्तेय), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। सभी जैन मुनि, श्रावक, श्राविका और आर्यिका को इन पंचशील सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।


    1. अहिंसा: जैन अनुयायियों और किसी भी धर्म को किसी भी परिस्थिति में हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए।

    2. सत्य: मनुष्य को सदैव सत्य के सानिध्य में रहना चाहिए और हमेशा सत्य बोलना चाहिए।

    3. अस्तेय: अस्तेय के अनुसार लोगों को मन के मुताबिक वस्तु ग्रहण न करते हुए केवल वही ग्रहण करना चाहिए जो उन्हें दिया जाता है।

    4. ब्रह्मचर्य: जैन धर्म के संबंधित लोगों को पवित्रता का पालन करना चाहिए और कामुक गतिविधियों दूर रहना चाहिए।

    5. अपरिग्रह: अपरिग्रह का पालन करते हुए जैनियों को सांसारिक मोह-माया एवं भोग की वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

    भगवान महावीर के अनमोल विचार और उपदेश:

    स्वामी महावीर अपने उपदेशों के कारण आज भी जाने जाते हैं। आइए उनके कुछ अनमोल वचनों को एक बार फिर से दोहराते है:-


    • जियो और जीने दो
    • अहिंसा परमो धर्म:
    • धर्म प्राप्ति के लिए जीतना पड़ता है, और जीतने के लिए संघर्ष बेहद जरूरी है।
    • धर्म को खुद से धारण करना होता है यह कोई माँगने की वस्तु नहीं।
    • अपने शत्रुओं पर विजय पाने से अच्छा, खुद पर विजय प्राप्त करना है।

    भगवान महावीर जी के 27 भव (Mahavir Swami 27 Bhav Story in Hindi)

    कहा जाता है कि कर्म किसी को नहीं छोड़ता, यहाँ तक की अगर वह भगवान की ही आत्मा क्यों ना हो। भगवान की आत्मा के 27 भव में से उन्होंने 14 भव मनुष्य के किये, 10 भव देव के, तिर्यंच को 1 भव, सिंह का और भगवान महावीर स्वामी द्वारा पूर्व के भवों में किए पाप के कारण 2 भव नरक के करने पड़े।


    भगवान Mahaveer Jain Religion के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे परन्तु जैन धर्म के पहले गुरु, तीर्थंकर और सस्थापक श्री आदिनाथ जी को माना जाता है जिन्हें ऋषभदेव जी के नाम से भी जानते है। श्री आदिनाथ भगवान (ऋषभदेव जी) का जन्‍म आज से करोड़ों वर्ष पूर्व अयोध्‍या नगरी में राजा नाभिराय जी और मरूदेवी जी के यहाँ हुआ था।

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